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खराब हेयरकट केस पर सुप्रीम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने सेवा में कमी मानी रकम कम
ITC मौर्या सैलून केस में सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा घटाकर 25 लाख रुपये किया
12 Feb 2026, 12:21 PM Delhi - New Delhi
Reporter : Mahesh Sharma
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New Delhi नई दिल्ली स्थित लग्जरी होटल ITC मौर्या के सैलून में खराब हेयरकट को लेकर शुरू हुआ विवाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ अपने अंतिम चरण में पहुंच गया। शीर्ष अदालत ने सेवा में कमी को स्वीकार करते हुए मुआवजे की राशि को घटाकर 25 लाख रुपये निर्धारित कर दिया।

यह मामला अप्रैल 2018 का है, जब मैनेजमेंट प्रोफेशनल आशना रॉय सैलून में हेयरकट के लिए गई थीं। उनका आरोप था कि स्टाइलिस्ट ने उनकी स्पष्ट सहमति के बिना बाल अपेक्षा से कहीं अधिक छोटे काट दिए, जिससे उन्हें पेशेवर और मानसिक नुकसान हुआ। उन्होंने दावा किया कि इस घटना से उनकी करियर संभावनाओं और आत्मविश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

मामला पहले राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) पहुंचा, जहां आशना रॉय को भारी भरकम मुआवजा देने का आदेश दिया गया था। सैलून प्रबंधन ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 6 फरवरी को अपना फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि सेवा में कमी (deficiency in service) का मामला बनता है, लेकिन मुआवजे की राशि तय करते समय ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों का होना आवश्यक है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता ने अपने दावों के समर्थन में मुख्यतः दस्तावेजों की फोटोकॉपी पेश की थीं। केवल फोटोकॉपी के आधार पर अत्यधिक राशि का मुआवजा देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि क्षतिपूर्ति का निर्धारण प्रमाणों और वास्तविक नुकसान के आधार पर होना चाहिए, न कि अनुमान पर।

फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक है, लेकिन मुआवजा संतुलित और तर्कसंगत होना चाहिए। अदालत ने इस मामले में 25 लाख रुपये का मुआवजा उचित ठहराया।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उपभोक्ता मामलों में संतुलन स्थापित करने वाला है। एक ओर जहां अदालत ने सेवा में कमी को गंभीरता से लिया, वहीं दूसरी ओर अत्यधिक दावों पर सख्ती दिखाई।

यह मामला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि यह एक लग्जरी सैलून से जुड़ा था और मुआवजे की प्रारंभिक राशि काफी अधिक थी। अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय के बाद इस लंबे विवाद पर विराम लग गया है।

फैसले से यह संदेश गया है कि उपभोक्ताओं के अधिकार सुरक्षित हैं, लेकिन दावों को मजबूत साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत करना अनिवार्य है।