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मौलाना का कड़ा ऐतराज
कांवड़ उठाने पर धार्मिक पहचान को लेकर छिड़ी बहस
संभल में मुस्लिम महिलाओं ने उठाई कांवड़, बयान से गरमाई धार्मिक बहस
17 Feb 2026, 11:52 AM Uttar Pradesh - Sambhal
Reporter : Mahesh Sharma
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Sambhal उत्तर प्रदेश के संभल जिले से सामने आए एक वीडियो ने धार्मिक आस्था और पहचान को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में कुछ मुस्लिम महिलाएं कांवड़ यात्रा में हिस्सा लेती दिखाई दे रही हैं। बताया जा रहा है कि इन महिलाओं ने भगवान शिव की भक्ति में कांवड़ उठाई और जलाभिषेक के लिए यात्रा की तैयारी की। वीडियो सामने आने के बाद यह मामला तेजी से चर्चा का विषय बन गया।

कांवड़ यात्रा पारंपरिक रूप से हिंदू धर्म की आस्था से जुड़ी मानी जाती है, जिसमें श्रद्धालु पवित्र नदियों से जल लाकर शिव मंदिरों में अर्पित करते हैं। ऐसे में मुस्लिम महिलाओं का इस यात्रा में शामिल होना कुछ लोगों को धार्मिक सौहार्द की मिसाल लगा, तो वहीं कुछ धार्मिक नेताओं ने इसे शरीयत के खिलाफ बताया।

इस मुद्दे पर बरेली से ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजबी का बयान सामने आया। मौलाना रजबी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस्लाम में दूसरे धर्मों के धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने की अनुमति नहीं है। उन्होंने इसे शरीयत के खिलाफ बताते हुए संबंधित महिलाओं को ‘गुनाह से बचने’ और ‘तौबा करने’ की सलाह दी। उनके बयान के बाद यह मामला और अधिक तूल पकड़ गया।

मौलाना ने कहा कि किसी भी मजहब की अपनी-अपनी धार्मिक मर्यादाएं और नियम होते हैं, जिनका पालन करना आवश्यक है। उन्होंने मुस्लिम समाज से अपील की कि ऐसे कदम न उठाए जाएं जिनसे समुदाय की धार्मिक पहचान पर सवाल खड़े हों। उनका कहना था कि धार्मिक सीमाओं का सम्मान करना ही बेहतर रास्ता है।

दूसरी ओर, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों का मानना है कि यह व्यक्तिगत आस्था का विषय है। उनका तर्क है कि भारत एक बहुलतावादी समाज है, जहां हर नागरिक को अपनी इच्छा से किसी भी धार्मिक आयोजन में भाग लेने की स्वतंत्रता है। उनके अनुसार, इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की बजाय इसे सामाजिक समरसता के रूप में देखा जाना चाहिए।

फिलहाल प्रशासन की ओर से किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई की सूचना नहीं है। पुलिस और स्थानीय प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं ताकि किसी प्रकार का तनाव न उत्पन्न हो।

यह घटना एक बार फिर इस सवाल को सामने लाती है कि व्यक्तिगत आस्था और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। जहां एक ओर धार्मिक नियमों की व्याख्या की जा रही है, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द की भी चर्चा हो रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस किस दिशा में जाती है और समाज इसे किस नजरिए से देखता है।