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ड्राई डे नियम में ढील
होली, मुहर्रम पर शराब बिक्री जारी रहेगी
छत्तीसगढ़ में बदली आबकारी नीति, होली-मुहर्रम पर खत्म हुआ ड्राई डे नियम
19 Feb 2026, 12:05 PM
Chhattisgarh -
Raipur
Reporter :
Mahesh Sharma
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Raipur छत्तीसगढ़ सरकार की नई आबकारी नीति ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। राज्य सरकार ने फैसला किया है कि होली, मुहर्रम और गांधी निर्वाण दिवस जैसे अवसरों पर अब ‘ड्राई डे’ लागू नहीं रहेगा। यानी इन दिनों लाइसेंस प्राप्त शराब की दुकानें खुली रहेंगी और बिक्री सामान्य दिनों की तरह जारी रहेगी।
परंपरागत रूप से धार्मिक और राष्ट्रीय महत्व के अवसरों पर कानून-व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाता रहा है। लेकिन नई नीति के तहत यह व्यवस्था बदल दी गई है। सरकार का तर्क है कि ड्राई डे के दौरान अवैध शराब की बिक्री और कालाबाजारी बढ़ जाती है, जिससे न केवल राजस्व का नुकसान होता है बल्कि कानून-व्यवस्था की समस्या भी पैदा होती है।
राज्य के आबकारी विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, अधिकृत दुकानों को खुला रखने से अवैध कारोबार पर अंकुश लगेगा और पारदर्शिता बनी रहेगी। सरकार का यह भी कहना है कि नियंत्रित और लाइसेंसधारी दुकानों के संचालन से सुरक्षा और निगरानी बेहतर तरीके से संभव है।
हालांकि, इस फैसले का विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने विरोध किया है। कई समूहों ने विशेष रूप से गांधी निर्वाण दिवस पर शराब बिक्री की अनुमति देने पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की स्मृति से जुड़ा है, जिन्होंने शराबबंदी का समर्थन किया था। ऐसे में इस दिन शराब की बिक्री की अनुमति देना उनकी विचारधारा के विपरीत है।
विपक्षी दलों ने भी सरकार पर सामाजिक संवेदनशीलता की अनदेखी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि राजस्व बढ़ाने के नाम पर सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, सरकार समर्थकों का तर्क है कि आधुनिक प्रशासनिक दृष्टिकोण में व्यवहारिकता को महत्व देना जरूरी है। उनका मानना है कि नियंत्रित बिक्री से अवैध गतिविधियों पर रोक लगेगी और राजस्व में वृद्धि होगी, जिससे विकास कार्यों को गति मिलेगी।
यह नीति बदलाव ऐसे समय में आया है जब कई राज्य अपनी आबकारी नीतियों में सुधार कर राजस्व बढ़ाने के उपाय तलाश रहे हैं। छत्तीसगढ़ का यह कदम अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है, हालांकि इसके सामाजिक प्रभावों पर नजर रखना जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, नई आबकारी नीति ने राज्य में सियासी और सामाजिक विमर्श को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले का जमीनी स्तर पर क्या असर पड़ता है और क्या सरकार अपने निर्णय पर कायम रहती है या दबाव के चलते किसी संशोधन पर विचार करती है।
परंपरागत रूप से धार्मिक और राष्ट्रीय महत्व के अवसरों पर कानून-व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाता रहा है। लेकिन नई नीति के तहत यह व्यवस्था बदल दी गई है। सरकार का तर्क है कि ड्राई डे के दौरान अवैध शराब की बिक्री और कालाबाजारी बढ़ जाती है, जिससे न केवल राजस्व का नुकसान होता है बल्कि कानून-व्यवस्था की समस्या भी पैदा होती है।
राज्य के आबकारी विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, अधिकृत दुकानों को खुला रखने से अवैध कारोबार पर अंकुश लगेगा और पारदर्शिता बनी रहेगी। सरकार का यह भी कहना है कि नियंत्रित और लाइसेंसधारी दुकानों के संचालन से सुरक्षा और निगरानी बेहतर तरीके से संभव है।
हालांकि, इस फैसले का विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने विरोध किया है। कई समूहों ने विशेष रूप से गांधी निर्वाण दिवस पर शराब बिक्री की अनुमति देने पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की स्मृति से जुड़ा है, जिन्होंने शराबबंदी का समर्थन किया था। ऐसे में इस दिन शराब की बिक्री की अनुमति देना उनकी विचारधारा के विपरीत है।
विपक्षी दलों ने भी सरकार पर सामाजिक संवेदनशीलता की अनदेखी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि राजस्व बढ़ाने के नाम पर सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, सरकार समर्थकों का तर्क है कि आधुनिक प्रशासनिक दृष्टिकोण में व्यवहारिकता को महत्व देना जरूरी है। उनका मानना है कि नियंत्रित बिक्री से अवैध गतिविधियों पर रोक लगेगी और राजस्व में वृद्धि होगी, जिससे विकास कार्यों को गति मिलेगी।
यह नीति बदलाव ऐसे समय में आया है जब कई राज्य अपनी आबकारी नीतियों में सुधार कर राजस्व बढ़ाने के उपाय तलाश रहे हैं। छत्तीसगढ़ का यह कदम अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है, हालांकि इसके सामाजिक प्रभावों पर नजर रखना जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, नई आबकारी नीति ने राज्य में सियासी और सामाजिक विमर्श को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले का जमीनी स्तर पर क्या असर पड़ता है और क्या सरकार अपने निर्णय पर कायम रहती है या दबाव के चलते किसी संशोधन पर विचार करती है।