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जर्जर स्कूल, बच्चों की जान खतरे में
टूटते स्कूल भवनों में पढ़ने को मजबूर ग्रामीण बच्चे।
लोहरदगा में जर्जर स्कूल भवन, खौफ के साए में पढ़ाई करते मासूम छात्र।
10 Feb 2026, 03:31 PM
Jharkhand -
Lohardaga
Reporter :
Mahesh Sharma
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Lohardaga लोहरदगा।
झारखंड के लोहरदगा जिले के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में स्थित सरकारी स्कूलों की हालत गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। कई स्कूल भवन इतने जर्जर हो चुके हैं कि वहां पढ़ने वाले बच्चों और शिक्षकों की जान हर दिन खतरे में रहती है। टूटती छतें, लटकते सरिए और दरकती दीवारें अब यहां की आम तस्वीर बन चुकी हैं।
🏫 खंडहर में बदलते स्कूल
लोहरदगा के मसूरियाखाड़ गांव स्थित सरकारी मिडिल स्कूल इसका ताजा उदाहरण है। इस स्कूल में करीब 42 बच्चे नामांकित हैं, जो रोज़ डर के माहौल में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के मौसम में हालात और भी भयावह हो जाते हैं, जब छत से पानी टपकता है और प्लास्टर गिरने लगता है।
📚 कमरों की भारी कमी
इसी तरह ठकुराइन डेरा स्थित सरकारी हाई स्कूल की स्थिति भी चिंताजनक है। यहां पहली से दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है, लेकिन उपलब्ध कमरे महज तीन हैं। इनमें भी पढ़ाई के बजाय इन्हें खंडहर कहना ज्यादा सही होगा। कई बार एक ही कमरे में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को बैठाकर पढ़ाना पड़ता है।
👩🏫 शिक्षकों की चिंता
स्कूल की शिक्षिका रानी कुमारी बताती हैं कि यह भवन लोहरदगा के सबसे पुराने स्कूल भवनों में से एक है। उनका कहना है कि अब केवल मरम्मत से काम नहीं चलेगा, बल्कि नए सिरे से भवन निर्माण की जरूरत है। उन्होंने कई बार संबंधित विभाग को इस समस्या से अवगत कराया है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
👨👩👧👦 अभिभावकों में डर
अभिभावक भी बच्चों को स्कूल भेजते समय आशंकित रहते हैं। उनका कहना है कि पढ़ाई जरूरी है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा उससे भी ज्यादा अहम है। कई माता-पिता बारिश के दिनों में बच्चों को स्कूल भेजने से कतराने लगे हैं।
🏛️ प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि शिक्षा विभाग और प्रशासन की ओर से इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। कई बार शिकायतों और निरीक्षण के बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं। ग्रामीणों की मांग है कि जर्जर भवनों को तुरंत ध्वस्त कर नए स्कूल भवनों का निर्माण कराया जाए।
🕊️ भविष्य दांव पर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो कोई बड़ा हादसा हो सकता है। बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
झारखंड के लोहरदगा जिले के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में स्थित सरकारी स्कूलों की हालत गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। कई स्कूल भवन इतने जर्जर हो चुके हैं कि वहां पढ़ने वाले बच्चों और शिक्षकों की जान हर दिन खतरे में रहती है। टूटती छतें, लटकते सरिए और दरकती दीवारें अब यहां की आम तस्वीर बन चुकी हैं।
🏫 खंडहर में बदलते स्कूल
लोहरदगा के मसूरियाखाड़ गांव स्थित सरकारी मिडिल स्कूल इसका ताजा उदाहरण है। इस स्कूल में करीब 42 बच्चे नामांकित हैं, जो रोज़ डर के माहौल में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के मौसम में हालात और भी भयावह हो जाते हैं, जब छत से पानी टपकता है और प्लास्टर गिरने लगता है।
📚 कमरों की भारी कमी
इसी तरह ठकुराइन डेरा स्थित सरकारी हाई स्कूल की स्थिति भी चिंताजनक है। यहां पहली से दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है, लेकिन उपलब्ध कमरे महज तीन हैं। इनमें भी पढ़ाई के बजाय इन्हें खंडहर कहना ज्यादा सही होगा। कई बार एक ही कमरे में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को बैठाकर पढ़ाना पड़ता है।
👩🏫 शिक्षकों की चिंता
स्कूल की शिक्षिका रानी कुमारी बताती हैं कि यह भवन लोहरदगा के सबसे पुराने स्कूल भवनों में से एक है। उनका कहना है कि अब केवल मरम्मत से काम नहीं चलेगा, बल्कि नए सिरे से भवन निर्माण की जरूरत है। उन्होंने कई बार संबंधित विभाग को इस समस्या से अवगत कराया है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
👨👩👧👦 अभिभावकों में डर
अभिभावक भी बच्चों को स्कूल भेजते समय आशंकित रहते हैं। उनका कहना है कि पढ़ाई जरूरी है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा उससे भी ज्यादा अहम है। कई माता-पिता बारिश के दिनों में बच्चों को स्कूल भेजने से कतराने लगे हैं।
🏛️ प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि शिक्षा विभाग और प्रशासन की ओर से इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। कई बार शिकायतों और निरीक्षण के बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं। ग्रामीणों की मांग है कि जर्जर भवनों को तुरंत ध्वस्त कर नए स्कूल भवनों का निर्माण कराया जाए।
🕊️ भविष्य दांव पर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो कोई बड़ा हादसा हो सकता है। बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।