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लगातार बदलते गठबंधन ने रचा नया इतिहास
बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, जहां नीतीश कुमार का नाम केंद्र में बना हुआ है। पिछले चार वर्षों में हर साल शपथ लेने का उनका रिकॉर्ड भारतीय राजनीति में बेहद अनोखा माना जा रहा है। हालिया घटनाक्रम के अनुसार उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का फैसला किया है और एक बार फिर नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह सिलसिला बताता है कि राज्य की सत्ता किस तरह गठबंधन की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
नीतीश कुमार का राजनीतिक करियर पिछले दो दशकों में कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। उन्होंने अलग-अलग समय पर अलग-अलग दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई, जिससे उनकी राजनीतिक रणनीति पर हमेशा चर्चा होती रही। यही कारण है कि वे लगातार सत्ता में बने रहने में सफल रहे हैं, लेकिन स्थिरता का सवाल हमेशा बना रहा।
इस्तीफों और शपथों का बना अनोखा रिकॉर्ड
यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 21 वर्षों में नीतीश कुमार 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं और 6 बार इस्तीफा भी दे चुके हैं। यह रिकॉर्ड उन्हें भारतीय राजनीति में एक अलग पहचान देता है। खास बात यह है कि 2005 के बाद से बिहार की राजनीति लगभग पूरी तरह उनके इर्द-गिर्द घूमती रही है।
हर बार जब राजनीतिक समीकरण बदले, उन्होंने बिना देर किए नई रणनीति अपनाई और सत्ता में वापसी की। यही कारण है कि उन्हें “सियासत का मास्टर स्ट्रेटेजिस्ट” भी कहा जाता है। हालांकि आलोचक इसे अवसरवाद की राजनीति भी मानते हैं।
चार साल में चार बार बदली सियासी तस्वीर
पिछले चार वर्षों की बात करें तो 2022, 2024, 2025 और अब 2026—हर साल सत्ता परिवर्तन का गवाह बना है। कभी उन्होंने पुराने सहयोगियों का साथ छोड़ा तो कभी नए गठबंधन के साथ सरकार बनाई। इस तरह बिहार की राजनीति में अस्थिरता का माहौल बना रहा।
2024 में उन्होंने एक बार फिर अपना रुख बदला और पुराने सहयोगियों के साथ लौट आए। इसके बाद 2025 में फिर से शपथ लेकर सरकार बनाई। अब 2026 में एक और बदलाव ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।
पहली बार मुख्यमंत्री बनने से अब तक सफर
नीतीश कुमार पहली बार 3 मार्च 2000 को बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन उनकी सरकार कुछ ही दिनों में गिर गई थी क्योंकि वे बहुमत साबित नहीं कर सके थे। इसके बाद 2005 में उन्होंने मजबूत वापसी की और राज्य की सत्ता पर काबिज हुए।
तब से लेकर अब तक उनका राजनीतिक सफर एक चक्र की तरह रहा है—इस्तीफा देना, नए गठबंधन के साथ लौटना और फिर सत्ता संभालना। यह सिलसिला उनकी राजनीति की खास पहचान बन चुका है।
अपने दम पर बहुमत न जुटा पाने की चुनौती
इतने लंबे राजनीतिक करियर के बावजूद एक तथ्य हमेशा चर्चा में रहा है कि नीतीश कुमार कभी भी अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सके। उन्हें हमेशा सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार बनानी पड़ी।
हालांकि गठबंधन की राजनीति में उनकी पकड़ इतनी मजबूत रही कि वे हर बार समीकरण साधने में सफल रहे। यही वजह है कि वे लंबे समय तक सत्ता में बने रहे, लेकिन आलोचना भी झेलते रहे।
आगे की राजनीति में क्या होंगे संकेत
वर्तमान घटनाक्रम यह संकेत देता है कि आने वाले समय में बिहार की राजनीति और अधिक दिलचस्प हो सकती है। लगातार बदलते गठबंधन यह दिखाते हैं कि कोई भी दल अकेले सत्ता में आने की स्थिति में नहीं है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि आगामी चुनावों में यह अस्थिरता बड़ा मुद्दा बन सकती है। वहीं, नीतीश कुमार की भूमिका भविष्य में भी निर्णायक बनी रह सकती है। उनका अनुभव और राजनीतिक समझ उन्हें अब भी राज्य की राजनीति का केंद्र बनाए हुए है।
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